समय का चक्र
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समय का चक्र और सेवा कार्य: श्री रामचंद्र सेवाधाम ट्रस्ट के विचार

तपती रेत, बदलते मौसम और समय का क्रूर पहिया...

तपती रेत, बदलते मौसम और समय का क्रूर पहिया…

राजस्थान की इस गौरवशाली धरा पर न जाने कितने राजा-महाराजा आए। उन्होंने अपने वैभव, अपनी शक्ति और अपने अहंकार को अमर करने के लिए पत्थरों के आलीशान महल खड़े किए, ऊंचे-ऊंचे दुर्ग बनाए। उन महलों में कभी शहनाइयां गूंजती थीं, कभी बड़ा ठाट-बाट था।

लेकिन आज? आज वे सब मौन हैं। समय की धूल ने उन आलीशान महलों को खंडहरों में बदल दिया है। उन सूनी दीवारों को देखकर आज एक ही सच सामने आता है—पत्थरों से किया गया मोह और केवल अपने लिए जिया गया जीवन, अंत में खंडहर ही बनता है।

संसार की इस भागदौड़ में हम सब भी तो यही कर रहे हैं। कोई पैसों का महल बना रहा है, कोई ऊंचे पदों का अहंकार पाल रहा है। लोग आते हैं, संग्रह करते हैं, और एक दिन यूं ही चले जाते हैं। पीछे रह जाती है सिर्फ धूल।

पर क्या सब कुछ खत्म हो जाता है?

नहीं! इतिहास गवाह है कि राजाओं के महल भले ढह गए हों, लेकिन सदियों पहले किसी प्यासे के लिए खुदवाई गई वो छोटी सी बावड़ी आज भी जीवित है। किसी भूखे को खिलाया गया अन्न का वो दाना आज भी दुआ बनकर हवाओं में तैर रहा है। बेजुबान पक्षियों और गौवंश के लिए किया गया करुणा का एक छोटा सा कार्य समय के इस पहिए से भी बड़ा है।

ईश्वर की इस अनूठी माया के बीच, असली जीवन वही है जो दूसरों के काम आ जाए। जब हम एकांत में बैठकर इस सच को पहचानते हैं, तो समझ आता है कि संसार को बड़ी-बड़ी मीठी बातों से नहीं बदला जा सकता। संसार तो अपनी गति से चलता रहेगा। लेकिन हमारी आत्मा का जो जुड़ाव इन बेजुबान जीवों से है, वही हमारी सच्ची पूंजी है।

आइए, पत्थरों के ढह जाने वाले महल बनाने के बजाय, ‘सेवा और करुणा के वो महल’ खड़े करें जो कभी खंडहर नहीं होते। आज इस नई सुबह में, किसी प्यासे पक्षी के लिए पानी का एक परिंडा रखें, किसी गौवंश को हरा चारा दें। क्योंकि जब हम इस धरा से जाएंगे, तो हमारे साथ हमारे महल नहीं, बल्कि हमारे हाथ से किया गया यही सेवा कार्य जाएगा।

“महल गिरे, साम्राज्य मिटे, मिट्टी में सब सोए, अमर रहा इस जगत में, जिसने सेवा बोए।”

— श्री रामचंद्र सेवाधाम ट्रस्ट

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