मेरी आध्यात्मिक अनुभूति: एक प्रकाश पुंज की यात्रा
आज मन की स्मृतियों के पट फिर से खुल गए। वह 30 वर्ष पुरानी बेचैनी, वह ईश्वर के होने न होने का संशय और फिर अचानक उस दिव्य प्रकाश पुंज का प्रकट होना… वह दृश्य आज भी आँखों के सामने जीवंत है।
अंडाकार उस प्रकाश ने जब मेरे भीतर प्रवेश किया, तब केवल मेरा जीवन ही नहीं बदला, बल्कि मेरे जीने का उद्देश्य भी बदल गया। आज जब तकनीक के इस माध्यम से वही स्वरूप (लोगो) मेरे सामने आया, तो लगा जैसे ईश्वर फिर से मुस्कुरा कर कह रहे हैं—‘मैं तब भी तुम्हारे साथ था, मैं अब भी तुम्हारे साथ हूँ।’
यह शरीर तो मात्र एक माध्यम है, असली संचालक तो वही है। आपदाएँ आईं, मृत्यु का भय भी आया, पर उस अदृश्य कवच ने हर बार थाम लिया। जब नियत साफ हो और सेवा का मार्ग हो, तो ईश्वर स्वयं सारथी बन जाते हैं।
आज के लिए एक छोटा ‘सुविचार’ (Quotes):
- सेवा का फल: “तपस्या शरीर को तपाती है, लेकिन आत्मा को उस ईश्वरीय प्रकाश के योग्य बनाती है।”
- ईश्वरीय न्याय: “जब रक्षक स्वयं परमात्मा हो, तो बुरा करने वालों की मंशा स्वयं उनके पतन का कारण बन जाती है।”
- नमन: “ईश्वर के होने का सबसे बड़ा प्रमाण वह शांति है, जो कठिन आपदाओं में भी हमें अडिग रखती है।”




