अग्निपुराण के अनुसार ज्योतिष शास्त्र का सार: संस्कार, मुहूर्त, तारा विचार और प्रमुख योग
अग्निपुराण के अनुसार
अग्निपुराण: ज्योतिष शास्त्र का सार, विवाह विचार एवं शुभ मुहूर्त
सनातन शास्त्रों में अग्निपुराण को ज्ञान का महाकोश माना गया है। इसके १२१वें अध्याय में भगवान अग्निदेव ने महर्षि वसिष्ठ को चार लाख श्लोकों वाले विशाल ज्योतिष शास्त्र का सारभूत अंश प्रदान किया है, जो दैनिक जीवन में शुभ-अशुभ के विवेक और सही समय के चयन में मार्गदर्शन करता है।
१. विवाह विचार एवं प्रमुख वर्जनाएं
- राशि-कूट विचार: कन्या की राशि से वर की राशि परस्पर ६-८ (षडष्टक), ९-५ (नवपंचम) और २-१२ (द्विर्द्वादश) होना अशुभ माना जाता है। स्वामियों में मित्रता होने पर ९-५ और २-१२ ग्राह्य हो सकते हैं, किंतु षडष्टक (६-८) में विवाह सर्वथा वर्जित है।
- सम-सप्तक: १०-४, ११-३ और सात-सात (सम-सप्तक) स्थिति विवाह के लिए शुभ होती है।
- ग्रह दोष: गुरु या शुक्र के अस्त रहने पर, धनु या मीन में सूर्य होने पर अथवा सिंह में गुरु होने पर विवाह कन्या के लिए वैधव्यकारक माना गया है।
- शुभ नक्षत्र व लग्न: रोहिणी, तीनों उत्तरा, मूल, स्वाति, हस्त और रेवती नक्षत्र; गोधूलि वेला; तथा तुला को छोड़कर मिथुनादि द्विस्वभाव व स्थिर लग्न विवाह हेतु प्रशस्त हैं।
२. प्रमुख संस्कार एवं जीवनोपयोगी मुहूर्त
| संस्कार / कार्य | शुभ नक्षत्र | शुभ वार / लग्न | विशेष नियम |
|---|---|---|---|
| पुंसवन | श्रवण, मूल, पुष्य | रवि, मंगल, गुरु | कुम्भ, सिंह, मिथुन लग्न |
| अन्नप्राशन | हस्तादि ५, पुष्य, कृत्तिकादि ३ | गुरु, शुक्रवार | मकर और मीन लग्न |
| कर्णवेध | पुष्य, श्रवण, चित्रा | बुध, गुरुवार | — |
| गृहारम्भ | रोहिणी, मृगशिरा, तीनों उत्तरा, स्वाति, हस्त, अनुराधा | मंगल और रविवार वर्जित | चैत्र, ज्येष्ठ, भाद्रपद, आश्विन, पौष, माघ वर्जित |
| गृहप्रवेश | धनिष्ठा, तीनों उत्तरा, शतभिषा | शुभ वार | — |
३. व्यापार, कृषि एवं धान्य संचय
- क्रय-विक्रय: अश्विनी, स्वाति, चित्रा, रेवती, शतभिषा और श्रवण में सामान खरीदना शुभ व लाभदायक होता है। भरणी, आश्लेषा, धनिष्ठा, तीनों पूर्वा और कृत्तिका में वस्तु बेचना शुभ रहता है, परंतु खरीदना घाटा देता है।
- कृषि कर्म: तीनों उत्तरा, स्वाति, रोहिणी, मृगशिरा, मूल, पुनर्वसु और हस्त नक्षत्र हल चलाने व बुवाई के लिए उत्तम माने गए हैं।
- धान्य वृद्धि मंत्र: अन्न की राशि में वृद्धि हेतु भोजपत्र पर निम्नलिखित मंत्र लिखकर रखने का विधान है:
“ॐ धनदाय सर्वधनेशाय देहि मे धनं स्वाहा।”
४. तारा विचार, त्रिपुष्कर योग एवं महादशा
- नवतारा शुद्धि: संपत्, क्षेम, साधक, मित्र और अतिमित्र ताराएं शुभ फल देती हैं। जन्म, विपत्, प्रत्यरि और मृत्यु तारा में नया कार्य या यात्रा वर्जित है।
- त्रिपुष्कर योग: भद्रा तिथियाँ (२, ७, १२), रवि/शनि/मंगल वार और त्रिचरण नक्षत्रों (कृत्तिका, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, विशाखा, उत्तराषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपदा) के संयोग से त्रिपुष्कर योग बनता है।
- अष्टोत्तरी महादशा मान: सूर्य (६ वर्ष), चन्द्र (१५ वर्ष), मंगल (८ वर्ष), बुध (१७ वर्ष), शनि (१० वर्ष), बृहस्पति (१९ वर्ष), राहु (१२ वर्ष) और शुक्र (२१ वर्ष)।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्र. अग्निपुराण के अनुसार विवाह में षडष्टक दोष क्यों त्याज्य है?
उत्तर: षडष्टक (६-८ का संबंध) अत्यंत अमंगलकारी माना गया है, इसलिए ग्रह-मैत्री होने पर भी इसमें विवाह की अनुमति नहीं दी गई है।
प्र. नए मकान की नींव रखने के लिए कौन-से महीने वर्जित हैं?
उत्तर: चैत्र, ज्येष्ठ, भाद्रपद, आश्विन, पौष और माघ मास में गृहारम्भ नहीं करना चाहिए।



