यथा दृष्टि, तथा सृष्टि: दृष्टि का आईना और संसार का सत्य
श्री रामचंद्र सेवाधाम ट्रस्ट, नवलगढ़ व रतनगढ़ | लेखक: मुकेश दास, सचिव
यथा दृष्टि तथा सृष्टि का अर्थ बहुत सरल है, पर जीवन में उतारना उतना ही कठिन। हम जिस दुनिया में जीते हैं, वह जितनी बाहर दिखती है, उससे कहीं अधिक हमारे भीतर गढ़ी जाती है। ऋषियों ने इसे सूत्र में कहा: “यथा दृष्टि तथा सृष्टि“, यानी जैसी आपकी दृष्टि होगी, संसार आपको वैसा ही दिखेगा।
नज़रिए का चश्मा
मन पूर्वाग्रहों, संस्कारों और अनुभवों से बना एक आईना है। उसमें हर घटना अपनी नहीं, देखने वाले के भावों की छवि बनकर दिखती है। सकारात्मक सोच कोई दिखावटी मुस्कान नहीं, बल्कि यही चश्मा साफ़ रखने की साधना है।
जिसके भीतर प्रेम, करुणा और संतोष है, उसे कठिन समय में भी कोई प्रेरणा मिल जाती है। जिसके मन में शंका और द्वेष है, उसे सबसे नेक बात में भी स्वार्थ दिखाई देता है। हम सच को भी अपने अहंकार के तराज़ू पर तौलते हैं, जबकि सच अपनी जगह तटस्थ और अडिग रहता है।
एक छोटा-सा दृश्य सोचिए। सुबह कोई आँगन में पक्षियों के लिए दाना और पानी रख रहा है। एक राहगीर इसे अन्न की बर्बादी समझता है, दूसरा इसमें करुणा देखता है। दृश्य एक ही है, पर दृष्टियाँ दो हैं। यही पक्षी सेवा का भी मर्म है: जो भीतर से संवेदनशील है, उसे हर चहचहाहट में जीवन की पुकार सुनाई देती है।
संसार का अनुशासन
यह संसार किसी एक व्यक्ति के पूर्वाग्रहों से नहीं, अपने सार्वभौमिक नियमों से चलता है। दिन के बाद रात आती है, पतझड़ के बाद बसंत, और कर्म के अनुसार फल मिलता है। सृष्टि एक विशाल मंच है, जहाँ अलग-अलग स्वभाव के लोग अपनी भूमिका निभा रहे हैं। यहाँ अच्छाई भी है और बुराई भी, आस्तिक भी हैं और नास्तिक भी। यही विविधता इस संसार का संतुलन है। हम सब इस महान विधान का एक छोटा-सा हिस्सा हैं।
तटस्थ दृष्टा भाव: अध्यात्म और जीवन का सेतु
इस संसार को उसकी समग्रता में वही समझ पाता है जो दिखावे से ऊपर उठकर भीतर की यात्रा करता है। अध्यात्म और जीवन अलग-अलग राहें नहीं हैं। अध्यात्म हमें भीड़ का हिस्सा बने रहने के बजाय तटस्थ दृष्टा भाव सिखाता है।
तटस्थ होकर देखने पर हम लोगों की सीमाएँ, उनका अज्ञान और उनके भीतर का द्वंद्व बिना उद्विग्न हुए समझ पाते हैं। तब यह बोध होता है कि हर व्यक्ति अपनी समझ और संस्कारों के अनुसार ही आचरण करता है। इसलिए दूसरों के रूखे व्यवहार या असहयोग से मन विचलित नहीं होता।
नज़रिया कैसे बदलें और आंतरिक शांति कैसे पाएँ
जीवन की सार्थकता इसमें है कि हम दूसरों के नज़रिए से आहत होने के बजाय अपनी आंतरिक शांति और स्पष्टता बनाए रखें। नज़रिया कैसे बदलें, इसका उत्तर संसार को बदलने की ज़िद में नहीं, अपनी दृष्टि को साफ़ करने में है। रोज़ कुछ क्षण मौन में बैठिए, प्रतिक्रिया देने से पहले ठहरिए, और खुद से पूछिए कि क्या मैं इसे अपने पूर्वाग्रह से देख रहा हूँ।
आंतरिक शांति कैसे पाएँ, इसका अनुभव तब होता है जब अंतःकरण निर्मल और संतुलित हो जाता है। तब बाहर का कोलाहल भी शांत संगीत जैसा सुनाई देने लगता है।
सेवा की दृष्टि: हमारा संकल्प
बच्चों की शिक्षा हो या पक्षियों की सेवा, दोनों कार्य तभी सार्थक होते हैं जब उनके पीछे साफ़ दृष्टि और निर्मल भाव हो। श्री रामचंद्र सेवाधाम ट्रस्ट नवलगढ़ और रतनगढ़ में इसी भाव से पक्षी सेवाऔर शिक्षाके क्षेत्र में कार्य कर रहा है। हमारा संकल्प है कि हर सेवा करुणा, तटस्थता और निष्कलंक दृष्टि से की जाए, क्योंकि जैसी हमारी दृष्टि होगी, वैसी ही सृष्टि हम गढ़ेंगे।
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
— मुकेश दास, सचिव श्री रामचंद्र सेवाधाम ट्रस्ट, नवलगढ़ | रतनगढ़




