मासूमों की किलकारियां गूंजने वाले स्कूल मौत का कुआं क्यों बन रहे हैं? — एक गंभीर आत्ममंथन
हाल ही में डूमरा गांव से आई एक हृदयविदारक खबर ने हर संवेदनशील इंसान की रूह झकझोर कर रख दी है। महज 13 साल के एक मासूम बच्चे द्वारा उठाया गया यह खौफनाक कदम कोई साधारण घटना नहीं है, बल्कि हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक ताने-बाने और परवरिश पर एक बड़ा तमाचा है। जब पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज खंगाली, तो सच सामने आया कि स्कूल के भीतर बच्चों के एक समूह ने उस मासूम को बेरहमी से पीटा और प्रताड़ित किया।
सवाल यह उठता है — क्या स्कूल अब विद्या के मंदिर न रहकर बच्चों के लिए खौफ का साया बनते जा रहे हैं?
कहाँ हो रही है चूक?
स्कूलों में घटती मानवीय संवेदनाएं: आज कुछ शिक्षण संस्थानों में अनुशासन के नाम पर या तो खौफ का माहौल है, या फिर बच्चों की हरकतों पर से शिक्षकों का नियंत्रण खत्म हो चुका है। शारीरिक दंड पर कानूनी रोक के बाद कई जगह अप्रत्यक्ष रूप से बच्चों के बीच हिंसक प्रवृत्तियों और बुलीइंग (धौंस जमाने) को बढ़ावा मिलने लगा है, जिसे समय रहते रोका नहीं जाता।
माता-पिता की व्यस्तता और संवाद की कमी: कई बार हम अपने रोजमर्रा के कामों में इतने उलझ जाते हैं कि बच्चे के चेहरे पर छाई उदासी, उसके मन का डर या उसके व्यवहार में आया बदलाव भांप ही नहीं पाते। बच्चा किस मानसिक दबाव से गुजर रहा है, यह जाने बिना ही हम उसे स्कूल भेजकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं।
कमजोर होती निगरानी: इंटरवल या खाली समय वह वक्त होता है जब बच्चों पर सबसे ज्यादा नजर रखने की जरूरत होती है। लेकिन लापरवाही के कारण ऐसी घटनाएं घट जाती हैं, जिनकी भरपाई कभी नहीं की जा सकती।
अब क्या करें? (एक जागरूक समाज का दायित्व)
यह घटना हम सभी अभिभावकों और समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यदि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे सुरक्षित रहें, तो हमें कुछ कड़े कदम उठाने होंगे:
सक्रिय संवाद: बच्चा जब भी स्कूल से घर लौटे, उससे प्यार से दिनभर की गतिविधियों के बारे में पूछें। उसके दोस्तों, उसकी संगति और स्कूल के माहौल पर पैनी नजर रखें।
बच्चों को निडर बनाएं: बच्चों को सिखाएं कि अगर स्कूल में कोई उन्हें परेशान करे, धमकाए या प्रताड़ित करे, तो वे चुप रहने के बजाय तुरंत अपने माता-पिता या भरोसेमंद शिक्षक को बताएं। डर के साए में जीना किसी समस्या का समाधान नहीं है।
संस्थाओं की जवाबदेही तय हो: हमें ऐसे स्कूलों और प्रबंधनों के खिलाफ आवाज उठानी होगी जो बच्चों की सुरक्षा के प्रति लापरवाह हैं। यदि कोई स्कूल बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता, तो अभिभावकों को एकजुट होकर ऐसे संस्थानों का बहिष्कार करना चाहिए।
निष्कर्ष
बच्चों की ऊर्जा, उनका बचपन और उनकी मुस्कान हमारे समाज की सबसे बड़ी थाती है। वे भविष्य के निर्माता हैं, और उन्हें हिंसा या प्रताड़ना की भट्टी में झोंकने से बचाने की जिम्मेदारी हम सबकी साझा है। आइए, इस दर्दनाक हादसे से सबक लें, अपने बच्चों के करीब आएं और उन्हें एक सुरक्षित, संवेदनशील और भयमुक्त माहौल दें।
बच्चा स्कूल पढ़ने जाता है, डरने या जान गंवाने नहीं। आइए, सजग बनें और अपने बच्चों की ढाल बनें।
लेख का समापन और ट्रस्ट का संदेश:
इसी संकल्प को साकार करने की दिशा में, श्री रामचन्द्र सेवा धाम ट्रस्ट आगामी नए सत्र से एक ऐसे आदर्श और सुरक्षित शैक्षणिक संस्थान की स्थापना करने जा रहा है, जहाँ बच्चों को केवल किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि एक भयमुक्त, संवेदनशील और संस्कारित वातावरण मिलेगा।
हमारा मानना है कि बच्चे केवल ईंट-पत्थर या नियमों से नहीं, बल्कि सही देखरेख, प्रेम और सकारात्मक ऊर्जा से विकसित होते हैं। हमारे इस नए प्रयास का मुख्य उद्देश्य एक ऐसा जिम्मेदार और पारदर्शी माहौल तैयार करना है, जहाँ हर अभिभावक निश्चिंत रह सके कि उनका बच्चा सुरक्षित हाथों में है।
आइए, बच्चों की सुरक्षा और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए हम सब मिलकर एक मजबूत समाज की नींव रखें।
— श्री रामचन्द्र सेवा धाम ट्रस्ट (नवलगढ़, राजस्थान) (समर्पित: बच्चों की सुरक्षा, उत्तम शिक्षा और नैतिक मूल्यों के लिए)

