अंधकार से प्रकाश की ओर: कारागार का जन्म, समरसता का शाश्वत संदेश और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी
भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि मानवीय चेतना को जगाने और जीवन के वास्तविक मूल्यों को समझने का पावन अवसर श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है।
आधी रात का सघन अंधकार, कारागार की लोहे की सलाखें, कड़े पहरे और बेड़ियों की जकड़न—सृष्टि के पालनहार भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य किसी राजमहल के वैभव में नहीं, बल्कि अत्यंत विषम परिस्थितियों और कष्टों के बीच हुआ। यह ऐतिहासिक व आध्यात्मिक प्रसंग हर युग के मनुष्य को यह सिखाता है कि विपत्तियां कितनी भी बड़ी क्यों न हों, वे सत्य, सेवा और संकल्प के मार्ग को कभी रोक नहीं सकतीं।
१. साधनहीनता और संघर्ष कभी लक्ष्य में बाधा नहीं बनते
कंस का कारागार यह कृष्ण जन्म कारागार संदेशदेता है कि विपरीत परिस्थितियां कभी मनुष्य के संकल्प से बड़ी नहीं होतीं। जब उद्देश्य धर्म, परोपकार और लोक-कल्याण का हो, तो बंद ताले भी खुल जाते हैं, पहरेदार निद्रालीन हो जाते हैं और उफनती यमुना भी शांत होकर मार्ग दे देती है। जीवन में साधन कम हों या चुनौतियां अधिक—सत्यनिष्ठ कर्म और अटूट धैर्य के सम्मुख हर बाधा नतमस्तक हो जाती है।
२. समरसता और समता का दर्शन: बाह्य रंग नहीं, अंतःकरण की शुचिता ही सत्य है
हमारे सनातन दर्शन की सबसे उदात्त विशेषता यह है कि उसने कभी बाहरी रंग-रूप को श्रेष्ठता का पैमाना नहीं माना।
श्याम वर्ण का रहस्य: मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण—दोनों को ही शास्त्रों में ‘श्याम वर्ण’ (मेघ वर्ण) के रूप में पूजा गया है। जल से भरे सघन मेघों का रंग श्याम होता है, जो बिना किसी भेदभाव के सम्पूर्ण धरा को जीवन और शीतलता प्रदान करते हैं। इसी भांति देवों के देव महादेव, जिन्होंने समुद्र-मंथन से निकले हलाहल विष को कंठ में धारण कर सृष्टि की रक्षा की, “नीलकंठ” कहलाए—उनका यह रूप हमें सिखाता है कि सच्ची महानता आत्म-त्याग और परहित में है, बाहरी सौंदर्य में नहीं।
जब साक्षात् ईश्वर ने सांवले वर्ण को धारण कर समस्त ब्रह्मांड को दिव्यता प्रदान की, तो फिर मानव समाज में रंग-रूप, गोरे-काले या बाह्य दिखावे के आधार पर भेद कैसा? वास्तविक सौंदर्य और दिव्यता मनुष्य के आचरण, उसकी सेवा-भावना, करुणा और हृदय की पवित्रता में है। श्रीकृष्ण का जीवन हमें हर संकीर्णता से मुक्त होकर प्रत्येक प्राणी में एक ही ईश्वरीय अंश देखने की दृष्टि देता है।
३. मुस्कुराते हुए हर चुनौती का सामना
कान्हा का संपूर्ण जीवन अनवरत संघर्षों की गाथा है। कारागार में जन्म, बाल्यावस्था से ही पूतना-तृणावर्त जैसे संकट, युवावस्था में आतताइयों से संघर्ष और महाभारत के महासमर का संचालन—इतने उतार-चढ़ावों के बावजूद उनके मुखमंडल से निश्चल मुस्कान कभी ओझल नहीं हुई। यह भाव उन्हें हर परिस्थिति में समभाव और स्थिरचित्त बनाए रखता था, जिसे कठिनाइयों के प्रति उनका दृष्टिकोण कहा जा सकता है—भागना नहीं, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा और मुस्कान के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन करना ही सच्चा योग है।
ट्रस्ट परिवार के नाम संदेश
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के इस पुनीत अवसर पर, ट्रस्ट से जुड़े सभी सम्मानीय संरक्षकों, कर्मठ सदस्यों, ऊर्जावान कार्यकर्ताओं, दानदाताओं एवं सहयोगियों को हार्दिक बधाई एवं मंगलकामनाएं।
प्रभु श्रीकृष्ण का जीवन हमें सिखाता है कि समाज के अंतिम पंक्ति के व्यक्ति की सेवा ही ईश्वर की सच्ची उपासना है। आइए, इस पावन पर्व पर हम सब मिलकर यह संकल्प लें:
हम समाज से हर प्रकार के बाह्य भेदभाव (रंग, जाति, वर्ग) को समाप्त कर सामाजिक समरसता और बंधुत्व की भावना को सुदृढ़ करेंगे।
अभावग्रस्त और जरूरतमंदों की सेवा के प्रति अपने समर्पण को और अधिक दृढ़ बनाएंगे।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विचार जीवन की किसी भी परिस्थिति में विचलित हुए बिना, निरंतर ऊर्जा और सकारात्मकता के साथ जन-कल्याण के मार्ग पर अग्रसर रहेंगे।
योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण आप सभी को उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, असीम ऊर्जा और आत्मिक शांति प्रदान करें।
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
भवदीय,
श्री मुकेश दास
सचिव






