जाम में फँसी एम्बुलेंस और परेशान आम नागरिक
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राष्ट्र सर्वोपरि: अराजकता, राजनीति और आम नागरिक का संघर्षआज ‘आंदोलन’ और ‘विरोध-प्रदर्शन’

जाम में फँसी एम्बुलेंस और परेशान आम नागरिक
जाम में फँसी एम्बुलेंस और परेशान आम नागरिक

आज ‘आंदोलन’ और ‘विरोध-प्रदर्शन’ के मायने काफ़ी बदल चुके हैं। कभी अपनी बात शासन-प्रशासन तक पहुँचाने का लोकतांत्रिक माध्यम माने जाने वाले ये साधन आज कई बार कुछ स्वार्थी तत्वों के हाथ की कठपुतली बन जाते हैं। सवाल यह है कि जब विरोध के नाम पर सड़कों पर पत्थर रखे जाएँ, रेल की पटरियाँ उखाड़ी जाएँ और आम जनजीवन ठप कर दिया जाए, तो क्या यह जनहित है या राष्ट्र के विरुद्ध गहरी साज़िश?

चंद सिक्कों के लालच में दाँव पर लगता देश

यह बेहद चिंताजनक और शर्मनाक है कि कुछ लोग थोड़े-से पैसों के लालच में भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं। वे भूल जाते हैं कि जिस सड़क पर वे जाम लगा रहे हैं और जिस ट्रेन या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचा रहे हैं, वह किसी राजनेता की जागीर नहीं है। वह हमारे देश और समाज की है और हम जैसे आम नागरिकों के खून-पसीने की कमाई से बनी है। चंद रुपयों के लिए व्यवस्था को बंधक बना लेना राष्ट्रद्रोह से कम नहीं है।

ट्रैफ़िक में फँसा आम इंसान और उसकी लाचारी

जब प्रदर्शन के नाम पर रास्ते रोके जाते हैं, तब शायद ही कोई वीआईपी (VIP) ट्रैफ़िक में फँसता है। इसका ख़ामियाज़ा आम नागरिक भुगतता है:

  • समय पर दफ़्तर या दुकान पहुँचने के लिए जूझते मज़दूर और कर्मचारी,
  • परीक्षा देने जा रहे छात्र,
  • और सबसे दर्दनाक, एम्बुलेंस में पड़ा वह मरीज़ जो अस्पताल पहुँचने के लिए ज़िंदगी और मौत से जूझ रहा होता है।

इस तरह की गुंडई और अराजकता फैलाने वाले देश का भला चाहने वाले नहीं हो सकते। उन्हें बस अपना स्वार्थ साधना होता है, और राजनीति के इशारे पर वे पूरे राष्ट्र को अशांति की आग में झोंक देते हैं।

युवाओं की ऊर्जा का हनन और देश की आर्थिक क्षति

युवाओं को ढाल बनाना:राजनीति के कुछ ठेकेदार नासमझ युवाओं को आगे कर देते हैं। जिन हाथों में देश का भविष्य सँवारने की ताक़त होनी चाहिए, उन्हें बहकावे और थोड़े-से रुपयों के बदले कानून हाथ में लेने पर मजबूर किया जाता है। यह युवाओं के भविष्य के साथ सरासर खिलवाड़ है।
आर्थिक चोट: ट्रेनें बंद होने और हाईवे ब्लॉक होने से सिर्फ़ आवाजाही नहीं रुकती, अर्थव्यवस्था का पहिया भी थम जाता है। एक दिन का व्यवधान भी छोटे दुकानदारों, दिहाड़ी मज़दूरों और परिवहन से जुड़े लोगों की रोज़ी-रोटी पर सीधा संकट बन जाता है।

कानून की सख़्ती ही सुरक्षा की गारंटी

लोकतांत्रिक देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी का अधिकार सबको है, लेकिन किसी को यह अधिकार नहीं कि वह दूसरों की स्वतंत्रता, सुरक्षा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाए। कानून-व्यवस्था से खिलवाड़ करने वाले ऐसे तत्वों के विरुद्ध बिना किसी नरमी के सख़्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। जब तक इन पर लगाम नहीं लगेगी, आम नागरिकों का चैन से जीना और देश का सुचारु रूप से आगे बढ़ना मुश्किल बना रहेगा।

हमारा संकल्प

एक जागरूक नागरिक और समाज के रूप में हमारा कर्तव्य है कि हम इस दूषित और स्वार्थी राजनीति को पहचानें। आइए संकल्प लें कि हम राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखेंगे और अराजकता के हर रूप का डटकर विरोध करेंगे। देश सुरक्षित है, तभी हम और हमारा समाज सुरक्षित है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

हाँ, शांतिपूर्ण विरोध संविधान से मिला अधिकार है। लेकिन यह अधिकार दूसरों की स्वतंत्रता, सुरक्षा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की छूट नहीं देता।

मज़दूर और कर्मचारी समय पर काम पर नहीं पहुँच पाते, छात्रों की परीक्षा छूट सकती है, और एम्बुलेंस में फँसे मरीज़ की जान तक ख़तरे में पड़ सकती है।

ट्रेनें और हाईवे बंद होने से माल ढुलाई और आवाजाही रुकती है। दिहाड़ी मज़दूरों, छोटे दुकानदारों और परिवहन से जुड़े लोगों की रोज़ी-रोटी पर सीधा असर पड़ता है।

भारत में सार्वजनिक संपत्ति क्षति निवारण अधिनियम, 1984 के तहत ऐसे मामलों में सज़ा का प्रावधान है। सटीक धाराओं के लिए किसी वकील या आधिकारिक स्रोत से पुष्टि कर ले

अफ़वाहों और बहकावे से बचें, शांतिपूर्ण और क़ानूनी तरीक़ों का समर्थन करें, और राष्ट्रहित को निजी या राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर रखें।

— मुकेश दास, सचिव, श्री रामचन्द्र सेवा धाम ट्रस्ट

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