नरक चतुर्दशी पर दीपक जलाकर सेवा का संकल्प – श्री रामचंद्र सेवा धाम ट्रस्ट, नवलगढ़
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नरक चतुर्दशी विशेष: संकीर्णता के ‘नरक’ से निकलकर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और विराट सेवा का मार्ग

श्री रामचंद्र सेवा धाम ट्रस्ट, नवलगढ़ | पक्षी सेवा एवं शिक्षा के क्षेत्र में समर्पित

नरक चतुर्दशी पर दीपक जलाकर सेवा का संकल्प – श्री रामचंद्र सेवा धाम ट्रस्ट, नवलगढ़
नरक चतुर्दशी पर दीपक जलाकर सेवा का संकल्प – श्री रामचंद्र सेवा धाम ट्रस्ट, नवलगढ़

आज नरक चतुर्दशी (छोटी दीपावली)का पावन अवसर है। लोक-कथाओं और परंपराओं में इस दिन को नरक के भय से मुक्ति और अज्ञान के अंधकार को मिटाने के रूप में मनाया जाता है। लेकिन यदि हम इसके दार्शनिक और आध्यात्मिक पक्ष पर गहराई से विचार करें, तो वास्तविक ‘नरक’ क्या है? और उससे मुक्ति का मार्ग क्या है?

आइए, इस शुभ पर्व पर जीवन के उन गहरे सत्यों पर दृष्टि डालें, जो हमें एक सीमित दायरे से निकालकर अनंत ब्रह्मांड से जोड़ते हैं।

क्या है ‘नरक’ और क्या है ‘साधना’?

जब तक मनुष्य का जीवन केवल ‘मैं और मेरे परिवार’ या छोटे-छोटे स्वार्थों तक सीमित रहता है, तब तक वह मानसिक और अहंकार के बंधन (नरक) में जकड़ा रहता है। यही संकीर्णता नरक चतुर्दशी का सबसे गहरा आध्यात्मिक अर्थ है।

इसके विपरीत, प्रकृति का हर घटक, चाहे वह सूर्य हो, चंद्रमा हो, नदियाँ हों या धरती, अपने पथ पर बिना रुके और बिना किसी स्वार्थ के निरंतर अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहा है। यदि प्रकृति अपने इस अनुशासन से ज़रा भी विचलित हो जाए, तो चारों ओर विनाश फैल जाएगा। इसी प्रकार, जब तक चेतना नियमों और स्वार्थों के चक्रव्यूह में बंधी रहती है, वह कठोर सीमाओं का अनुभव करती है। और इन सीमाओं को तोड़कर निःस्वार्थ कर्म में लग जाना ही साधना है।

प्रकृति का समभाव: सृष्टि का मूल संदेश

इस सृष्टि के मूल में प्रकृति का ‘निरपेक्ष समभाव’ काम कर रहा है।

  • यदि पृथ्वी यह देखने लग जाए कि कौन अपना है और कौन पराया, और वह अपना उपजाऊपन या आधार देना बंद कर दे;
  • यदि सूर्य भेदभाव करने लग जाए और किसी को धूप दे और किसी को अंधेरे में छोड़ दे;
  • यदि हवा पक्षपात करने लग जाए और किसी को प्राणवायु दे और किसी से छीन ले;
  • यदि जल (नदियाँ और वर्षा) भेदभाव करने लग जाए और अपनी शीतलता व प्यास बुझाने का गुण चुनिंदा लोगों तक सीमित कर दे;
  • और यदि अग्नि भेद करने लग जाए,

तो उसी क्षण संपूर्ण सृष्टि और सभी जीवों का विनाश तय है। प्रकृति कभी भेदभाव नहीं करती, वह बिना किसी शर्त के सबके कल्याण में लगी रहती है। इसीलिए प्रकृति का यही नियम हमें सिखाता है कि हम सभी को भी बिना किसी भेदभाव, ऊँच-नीच या अपने-पराए के भेद के, मिलकर और परस्पर सहयोग से रहना चाहिए।

त्याग, सेवा और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’: संपूर्ण पृथ्वी ही परिवार

जो साधु-संन्यासी या सेवा-व्रती इस संसार के छोटे-छोटे चक्करों से ऊपर उठ जाते हैं, वे संसार को ही अपना घर मान लेते हैं। यही ‘वसुधैव कुटुम्बकम्‘ का सच्चा अर्थ है।

जब पूरी पृथ्वी ही आपका परिवार बन जाती है, तो आपकी ममता किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि संपूर्ण धरा आपकी अपनी हो जाती है।

जब आप अपने हर क्रियाकलाप को पूर्ण रूप से सेवा-भाव में समर्पित कर देते हैं, तब आपका व्यक्तिगत अस्तित्व सीमाओं को तोड़कर इस अनंत ब्रह्मांड का स्वरूप ले लेता है।

निष्कर्ष और संकल्प

“यह ज्ञान एक निरंतर बहती गंगा की तरह है, जिसकी थाह वही लोग पाते हैं जिन्हें आत्मबोध और सेवा का मार्ग मिल जाता है।”

श्री रामचंद्र सेवा धाम ट्रस्ट के माध्यम से नवलगढ़ और रतनगढ़ में हमारा यही प्रयास है कि हम केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित न रहें। पक्षी सेवा के द्वारा मूक प्राणियों की सेवा करते हुए और शिक्षा के माध्यम से आने वाली पीढ़ी को संस्कार और सुरक्षित भविष्य देते हुए, हम अपने जीवन को इस विराट चेतना से जोड़ सकें।

इस नरक चतुर्दशी पर आइए हम संकल्प लें कि हम अपने भीतर के संकीर्ण स्वार्थ, अहंकार और भेदभाव रूपी ‘नरक’ को त्यागकर, प्रकृति की तरह समदर्शी बनें और सेवा व समर्पण के प्रकाश से अपने जीवन को आलोकित करें।

श्री रामचंद्र सेवा धाम ट्रस्ट, नवलगढ़ (सचिव: श्री मुकेश दास)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

लोक-परंपरा में इस दिन को नरक के भय से मुक्ति और अज्ञान के अंधकार के नाश का पर्व माना जाता है। इसे छोटी दीपावली भी कहते हैं, और इस दिन दीपक जलाकर जीवन से अंधकार मिटाने का संकल्प लिया जाता है।

जब जीवन केवल “मैं और मेरे परिवार” तक सिमट जाता है और व्यक्ति स्वार्थ व अहंकार के बंधन में जकड़ा रहता है, तो वही संकीर्णता असली ‘नरक’ है। इससे निकलने का मार्ग है सेवा, समभाव और सबको अपना मानना।

इसका अर्थ है कि संपूर्ण पृथ्वी ही एक परिवार है। जब हम धरती के हर प्राणी को अपना मान लेते हैं, तो हमारी ममता और सेवा किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती।

सूर्य, जल, वायु, पृथ्वी और अग्नि बिना भेदभाव के सबके कल्याण में लगे रहते हैं। यही सीख हमें भी अपनाने की है कि ऊँच-नीच और अपने-पराए का भेद छोड़कर परस्पर सहयोग से रहें।

ट्रस्ट नवलगढ़ और रतनगढ़ में मुख्य रूप से दो क्षेत्रों में कार्य कर रहा है: पक्षी सेवा और शिक्षा। आप स्वयंसेवक के रूप में जुड़कर या सहयोग देकर इस सेवा-कार्य का हिस्सा बन सकते हैं।

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