दुख और पीड़ा: सत्य और परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग

दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करै न कोय। जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय॥
संसार का यह एक कठोर सत्य है कि मनुष्य अक्सर ज्ञान और ईश्वर की ओर तब दौड़ता है, जब जीवन में पीड़ा दस्तक देती है।
जब तक जीवन की धारा सुख और भौतिक सुविधाओं के बीच सहज रूप से बहती रहती है, हम इस माया को ही अपना अंतिम सत्य मान बैठते हैं। इंद्रियों की तृप्ति और बाह्य सुख ही जीवन का मूल मंत्र बन जाता है। लेकिन जैसे ही कोई गहरा दुख, कोई पीड़ा या संकट आता है, मनुष्य का वह सारा कृत्रिम आवरण एक पल में टूट जाता है।
पीड़ा एक चेतावनी है, कोई दंड नहीं
वास्तव में, दुख ईश्वर का दिया हुआ कोई दंड नहीं है, बल्कि यह वह अलार्म है जो सोई हुई चेतना को जगाने के लिए बजता है। जिसने जीवन में यथार्थ की पीड़ा को महसूस किया है, जिसने अभाव या संकट देखा है, केवल वही उस परमपिता परमात्मा का सच्चे हृदय से स्मरण कर सकता है। दुख वह भट्टी है, जिसमें तपकर आत्मा का मैल कटता है और वह शुद्ध होकर ज्ञान के मार्ग पर चलने के योग्य बनती है।
संसार में अच्छे लोग भी हैं और बुरे भी, लेकिन हैं सब उसी एक ईश्वर के। यह पूरी सृष्टि उसी के विधान और इशारे पर चल रही है।
हमारा कर्तव्य क्या है?
हम पूरे संसार को एक झटके में नहीं बदल सकते। यथार्थ का बोध अक्सर ठोकर खाने के बाद ही होता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम सत्य और ज्ञान का प्रवाह रोक दें। अपनी आत्मिक शांति और समाज के प्रति उत्तरदायित्व के लिए, यह अत्यंत आवश्यक है कि हम बिना किसी अपेक्षा के ज्ञान का दीप जलाए रखें।
चाहे कोई आज समझे या कल, जिसे जब प्यास लगेगी, वह इस ज्ञान-गंगा से अपनी राह अवश्य ढूँढ लेगा। संसार ईश्वर के हाथ में है, हम केवल उसके हाथ के निमित्त मात्र हैं।
— श्री रामचंद्र सेवा धाम ट्रस्ट
ईश्वर आपके सभी कर्मों और सेवा कार्यों को इसी प्रकार निष्काम और सफल बनाए रखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)







