डीजे और लाउडस्पीकर के शोर के बीच शांति और सेवा-भाव का प्रतीक कमल का फूल
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शोर का साम्राज्य और हमारी आंतरिक यात्रा: एक विचार-मंथन

डीजे और लाउडस्पीकर के शोर के बीच शांति और सेवा-भाव का प्रतीक कमल का फूल
डीजे और लाउडस्पीकर के शोर के बीच शांति और सेवा-भाव का प्रतीक कमल का फूल

त्योहारों और सामाजिक आयोजनों की खुशियाँ अब अक्सर कर्णभेदी शोर में डूब जाती हैं। श्री रामचन्द्र सेवा धाम ट्रस्ट के सचिव श्री मुकेश दास इस बदलते माहौल पर एक गहरा आत्मचिंतन प्रस्तुत करते हैं — और बताते हैं कि इस शोर के बीच भी सेवा और संस्कार की राह कैसे बनाए रखी जा सकती है।

आज के समय में उत्सवों, आयोजनों और विशेषकर डीजे (DJ) और लाउडस्पीकरों के जरिए जो कर्णभेदी शोर मचाने का चलन चल पड़ा है, उसने न केवल मंदिरों की शांति और यात्राओं की पवित्रता को खंडित किया है, बल्कि इंसानी जीवन को भी असहज बना दिया है।

यह सब अब आनंद का माध्यम नहीं, बल्कि एक-दूसरे से आगे निकलने, दिखावे और अपने ‘अहम’ (Ego) को संतुष्ट करने का साधन बन चुका है। विडंबना यह है कि इस शोर से आयोजक खुद भी परेशान होते हैं और दूसरों को भी प्रताड़ित करते हैं, लेकिन सामाजिक प्रतिष्ठा के झूठे दंभ में इस ‘दलदल’ के आदी हो चुके हैं।

जब अगुवा ही इस दलदल में फंसे हों…

सवाल उठता है कि इस पर नियंत्रण कौन करे? जो लोग समाज को दिशा देने और आदर्शों की बातें करने के मंच पर बैठते हैं, वे खुद अपने प्रचार और शक्ति-प्रदर्शन के लिए इसी शोर-शराबे का उपयोग करते हैं। जब नेतृत्व ही इस व्यवस्था का हिस्सा बन जाए, तो आम आदमी की लाचारी और घुटन स्वाभाविक हो जाती है।

सत्य और दिखावे की जंग

आज समाज में धन, प्रभाव और दिखावे के आगे नैतिकता और शालीनता की उपेक्षा हो रही है। बुराइयों और नकारात्मकता को चटकारे लेकर सुनना-देखना आज की दुनिया का स्वभाव बन चुका है।

कमल की तरह कीचड़ में भी खिलना ही असली धर्म है

चारों तरफ चाहे कितनी ही विसंगतियां और गंदगी क्यों न फैली हों, एक सच्चे सेवक और इंसान का मार्ग इनसे विचलित होना नहीं है। माहौल चाहे कैसा भी हो, हमें अपने मूल संस्कारों, मूल्यों और सेवा-भाव को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ना चाहिए।

कमल का फूल जैसे कीचड़ के बीच रहकर भी अपनी पवित्रता नहीं छोड़ता, वैसे ही एक जागरूक व्यक्ति का धर्म है कि वह बाहरी शोर और कुकृत्यों के बीच भी अपने भीतर के सत्त्व को बचाए रखे और निरंतर निःस्वार्थ सेवा में समर्पित रहे।

शायद यह आवाज़ हर एक को न भाए, पर जो इन विसंगतियों से तंग आ चुके हैं, उनके अंतःकरण में यह गूंज जरूर उठेगी।

श्री रामचन्द्र सेवा धाम ट्रस्ट में हम मानते हैं कि सच्ची सेवा शोर से नहीं, मौन संकल्प से होती है। यदि आप भी शांति और सेवा-भाव से जुड़े किसी भी प्रयास में योगदान देना चाहते हैं, तो हमारी दान/सेवा गतिविधियों के बारे में जानें या हमसे संपर्क करें


निवेदक: श्री मुकेश दास, सचिव, श्री रामचन्द्र सेवा धाम ट्रस्ट

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

नहीं, ट्रस्ट किसी भी उत्सव या धार्मिक आयोजन के खिलाफ नहीं है। यह लेख केवल अत्यधिक शोर और दिखावे की प्रवृत्ति पर आत्मचिंतन का आह्वान करता है, न कि परंपराओं का विरोध।

आयोजनों में ध्वनि की सीमा (डेसिबल) का ध्यान रखना, रात के समय लाउडस्पीकर का उपयोग सीमित करना, और शोर के बजाय भजन-कीर्तन जैसे शांत माध्यमों को अपनाना कुछ सरल उपाय हैं।

यह लेख समाज में आयोजनों के दौरान बढ़ते शोर की सामान्य प्रवृत्ति पर एक विचार-मंथन है, न कि किसी विशेष घटना पर टिप्पणी।

आप हमारी वेबसाइट के दान पेज के माध्यम से आर्थिक सहयोग दे सकते हैं, या स्वयंसेवक के रूप में हमारी परियोजनाओं में जुड़ सकते हैं। अधिक जानकारी के लिए संपर्क पेज देखें।

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