चुंबक, प्रकृति और इंसानी फितरत: क्या सचमुच कोई दुश्मन मित्र बन सकता है?
श्री रामचंद्र सेवाधाम ट्रस्ट – रतनगढ़ एवं नवलगढ़
संसार में सदियों से एक सवाल बार-बार उठता रहा है: क्या दुश्मन कभी मित्र बन सकता है?
राजनीति और कूटनीति की दुनिया इसका उत्तर देती है कि “न कोई स्थायी मित्र होता है, न कोई स्थायी शत्रु; केवल हित स्थायी होते हैं।” समय और परिस्थितियाँ बदलती हैं तो पुराने विरोधी भी हाथ मिला लेते हैं। लेकिन जब हम इसी सवाल को कूटनीति के चश्मे से उतारकर जीवन और मानवीय रिश्तों की कसौटी पर कसते हैं, तो तस्वीर कुछ और दिखाई देती है। हाथ मिल जाना एक बात है, और मन का मिल जाना बिल्कुल दूसरी बात।
आइए प्रकृति के नियमों और इंसानी फितरत के आईने में इस सच्चाई को समझने का प्रयास करें।
रहीम का दोहा और टूटे रिश्तों की ‘ठसक’
जब भी रिश्तों के टूटने और जुड़ने की बात होती है, तो महाकवि रहीम का दोहा अपने आप याद आ जाता है:
रहीमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय॥
रहीम यह नहीं कह रहे थे कि टूटा रिश्ता दोबारा जुड़ ही नहीं सकता। धागा जुड़ता है, पर गाँठ के साथ। यही गाँठ वह ‘ठसक’ है, यानी मन की टीस, हल्का-सा अविश्वास और भीतर बची हुई कड़वाहट। टूटे रिश्ते समझौते, मजबूरी या समय के दबाव में दोबारा चल पड़ें, तब भी उनमें पहले जैसी सहजता कम ही लौटती है। विश्वास के शीशे में एक बार पड़ी दरार लाख लीपापोती के बाद भी पहले जैसी निर्मल नहीं होती।
इसलिए यहाँ सबसे ज़रूरी भेद यह है कि संबंध को फिर से चलाया जा सकता है, पर विश्वास को दोबारा कमाना पड़ता है, और वह समय लेता है।
प्रकृति का नियम: जड़ कभी पत्ती नहीं बनती
प्रकृति अपने मूल स्वभाव से समझौता नहीं करती। जड़ अपनी जगह जड़ रहती है और पत्ती अपनी जगह पत्ती। दोनों का अपना काम है, अपना स्वरूप है।
मनुष्य के मूल चरित्र पर भी यही बात काफी हद तक लागू होती है। जिसके मन में किसी के प्रति ईर्ष्या या दुर्भावना की जड़ गहरी जम चुकी हो, उसे आप कितना भी खाद-पानी (प्रेम, सहयोग, उपकार) दें, वह जड़ आपके कहने से नहीं सूखती। स्वभाव का बदलना असंभव भले न हो, पर वह बहुत कठिन है, और जब भी बदलता है तो भीतर से बदलता है। कोई दूसरा उसे बाहर से नहीं बदल सकता। अक्सर इसके लिए जीवन की कोई बड़ी ठोकर, कोई गहरा पछतावा या कोई बड़ा आत्म-बोध चाहिए होता है।
हमने यह भी देखा है कि बैर दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहता। वह परवरिश और संस्कारों के रास्ते बाप से बेटे और बेटे से उनके बच्चों तक विरासत की तरह चलता जाता है। और विडंबना देखिए कि जो लोग जीवनभर किसी के रास्ते में काँटे बिछाते रहे, वे अक्सर तभी पिघलते हैं जब वह व्यक्ति दुनिया से विदा हो जाता है। तब उन्हें अहसास होता है कि “हमने इसे कितना सताया, पर इसने कभी हमारा बुरा नहीं चाहा।” पर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। पश्चाताप समय पर आए, तभी उसका मोल है।
संसार भी एक चुंबक है: ध्रुव का नियम
भौतिक विज्ञान का सबसे बुनियादी उदाहरण चुंबक है, और उसका नियम जीवन का आईना बन जाता है। चुंबक के समान ध्रुव एक-दूसरे को दूर धकेलते हैं और विपरीत ध्रुव एक-दूसरे को खींच लेते हैं। चुंबक अपनी मूल प्रकृति कभी नहीं बदलता।
पर यहाँ एक गहरी बात छिपी है, जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। चुंबक का स्वभाव नहीं बदलता, बदलती है स्थिति, यानी कौन-सा ध्रुव किसके सामने है। उसी चुंबक को घुमा दो तो जो पहले धकेल रहा था, वही खींचने लगता है। यही रिश्तों का सत्य है। जब तक दो लोगों के विचार, हित और भावनाएँ एक दिशा में हैं, तब तक अपनापन है; जैसे ही दिशाएँ टकराती हैं, वही अपने पराए लगने लगते हैं। इसमें हर बार किसी का दोषी होना ज़रूरी नहीं, कई बार बस ध्रुव का फर्क होता है।
और यहीं इंसान चुंबक से आगे निकल जाता है। चुंबक के पास चुनाव नहीं है, पर मनुष्य के पास विवेक है। प्रकृति की इस सबसे चेतन और अनमोल रचना (कोहिनूर के हीरे जैसी) के पास यह शक्ति है कि वह अपना रुख स्वयं चुन सके। हम दूसरे का ध्रुव नहीं बदल सकते, पर अपना रुख, अपनी प्रतिक्रिया और अपना व्यवहार चुन सकते हैं। यही हमारे हाथ में है।
तो फिर क्या करें? यथार्थ को स्वीकार करना ही शांति है
जब हम यह मान लेते हैं कि इंसानी फितरत आसानी से नहीं बदलती और हर संबंध की अपनी सीमा होती है, तो जीवन सहज होने लगता है। पर इसका अर्थ हर किसी को शक की नज़र से देखना नहीं है। इसका अर्थ है विवेक के साथ जीना:
- सबसे सद्भाव, पर विश्वास कसौटी पर। आत्मा के स्तर पर सब एक हैं, इसलिए किसी से द्वेष रखने का कारण नहीं। पर व्यवहार के स्तर पर लोगों के ध्रुव अलग-अलग हो सकते हैं, इसलिए भरोसा समय और आचरण देखकर दिया जाए।
- शिकायत और बदले की भावना से मुक्ति। जब हमने मान लिया कि सामने वाले की जड़ उसकी अपनी है, तो उससे बार-बार वही अपेक्षा रखकर दुखी होने का कोई अर्थ नहीं रहता।
- दरवाज़ा बंद नहीं, पर पहरा खुला। यदि कोई सचमुच बदलकर लौटे तो उसे अवसर दिया जा सकता है, लेकिन गाँठ को याद रखते हुए।
- अपेक्षा-रहित सेवा। जो काम फल की आशा के बिना किया जाए, वह दुश्मनी और दोस्ती दोनों के पार चला जाता है।
सेवा का मार्ग: जहाँ कोई दुश्मन नहीं होता
श्री रामचंद्र सेवाधाम ट्रस्ट अपने दो क्षेत्रों, पक्षी सेवा और शिक्षा, में इसी भाव से काम करता है। रतनगढ़ और नवलगढ़ में जब हम किसी घायल या प्यासे पक्षी की सेवा करते हैं, तो वह यह नहीं पूछता कि हम उसके मित्र हैं या नहीं, और न हम यह पूछते हैं कि वह हमारे किस काम आएगा। यही सेवा का सबसे शुद्ध रूप है।
शिक्षा के क्षेत्र में हमारा विश्वास है कि बैर की जो परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती है, उसे तोड़ने का सबसे प्रभावी साधन अच्छे संस्कार और सही शिक्षा ही हैं। जिस बच्चे को सिखाया जाए कि असहमति का अर्थ शत्रुता नहीं है, वह कल की नफ़रत की कड़ी को आगे नहीं बढ़ाएगा।
आइए, हम सब मिलकर ऐसा समाज गढ़ें जहाँ गाँठें कम पड़ें, जहाँ विवेक के साथ सद्भाव हो, और जहाँ सेवा किसी की मित्रता या शत्रुता की मोहताज न हो।
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
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— श्री रामचंद्र सेवाधाम ट्रस्ट




